Blogging · Poetry

रहग़ुज़र और मंज़िल (Pathway And Destination)

वो कहते थे मुश्किल होगा वक़्त आगे बड़ा पर

बेफि़क्र हम थे पड़े,

कुछ जो लकी़रें कर गईं वो ले बैठे,

कुछ क़ब्र अपने हाथों खोद लिए,

जानता था तनहाई निगल जाएगी पर

सुनहरे मुस्तक़बिल की चाहत भी तो थी,

क़दम-दर-क़दम सफर बढ़ता गया,

मंज़िल फिर भी निगाहों से कोसों दूर थी,

ज़ख्मी हलकान पैर बढ़ते गए,

हारना क़ुबूल जो नहीं कभी,

रहग़ुज़र ने मोहब्बत कुछ ऐसी शिद्दत से की है के

इससे बेवफाई कर दोज़ख में नहीं जाना चाहता,

नज़रें फिर भी तलाश रहीं हैं उस मंज़र को हरदम,

जब माशूका को छोड़ हमसफर को आग़ोश में भरेंगे हम ।।
They told me times ahead would be hard but,

I had been aloof to it.

Some of it was destined,

Some graves I dug myself,

Knew loneliness would consume me whole,

But wasn’t there was the desire for a better future too,

With every step the journey lengthened,

The destination was still miles away,

Battered exhausted feet kept moving on,

As conceding defeat had never been an option,

The pathway has loved me with such passion that

I don’t want to be condemned for betraying it,

And yet the eyes keep searching for that moment when,

I’d leave the lover to embrace the soulmate.

Image courtesy : Google Images/www.sexypeat.wordpress.com

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28 thoughts on “रहग़ुज़र और मंज़िल (Pathway And Destination)

  1. ऊर्दू के ग़, फ़, ज़ में बिंदु लगाते-लगाते सुर-ताल का बैंड बज गया। ये तो रही आलोचना।

    कोशिश भी लाजवाब और सोच भी। अगली बार और खिल के निकलेगा। पक्का!

    Liked by 1 person

    1. खुशी हुई आपकी टिप्पणी पढ़कर । पढ़ने, आलोचना और हौसलाअफज़ाई सभी के लिए आपका शुक्रिया । आशा है अगली दफा आपकी ऊम्मीद पर खरी उतरेंगे ।

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